दो दिन पहले भाई की चिता को दी मुखाग्नि… और फिर जमशेदपुर के मंच पर गूंजा ‘इंटरनेशनल लिट्टी-चोखा’! भाई की चिता की आग ठंडी भी नहीं हुई… 48 घंटे बाद मंच पर गूंजा मनोज तिवारी का ‘लिट्टी-चोखा’! महज दो दिन में बदला रंग?

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जमशेदपुर:- जमशेदपुर की सावन की अंतिम सोमवारी भक्ति के रंग में रंगी थी। साकची के गुरुद्वारा मैदान में हजारों श्रद्धालु जुटे थे और मंच पर भोजपुरी गायक व सांसद मनोज तिवारी अपनी आवाज से समां बांध रहे थे।

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‘इंटरनेशनल लिट्टी-चोखा, जे खइलस ना पइलस धोखा…’ जैसे गीतों पर भीड़ झूमती रही। हर-हर महादेव और बोल बम के जयघोष से पूरा मैदान गूंजता रहा।

लेकिन इस जश्न और भक्ति के बीच एक सवाल जरूर उठ रहा है—क्या मंच पर लौटने का यह फैसला इतनी जल्दी जरूरी था?

दरअसल, मनोज तिवारी के बड़े भाई साधु शरण तिवारी का निधन दो दिन पहले ही हुआ था और 23 अगस्त को वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। परिवार के सदस्यों और करीबियों की मौजूदगी में अंतिम संस्कार की रस्में पूरी हुई थीं। और इसके महज दो दिन बाद जमशेदपुर में आयोजित हर हर महादेव सेवा संघ के 26वें वार्षिक आयोजन में मनोज तिवारी मंच पर नजर आए।

यहां सवाल किसी कलाकार की प्रतिभा, किसी धार्मिक आयोजन या भक्ति की भावना पर नहीं है। सवाल सिर्फ वक्त का है… रिश्तों की संवेदनशीलता का है… और उस निजी दुख का है, जिसे हर व्यक्ति अपने-अपने तरीके से जीता है।

हो सकता है मंच पर लौटना उनके लिए व्यक्तिगत तौर पर दुख से उबरने या अपनी जिम्मेदारी निभाने का तरीका रहा हो। यह भी संभव है कि कार्यक्रम पहले से तय हो और उसे रद्द करना उनके लिए आसान न रहा हो।

लेकिन सोशल मीडिया और सार्वजनिक जीवन के दौर में जब कोई सार्वजनिक व्यक्ति निजी शोक के तुरंत बाद हजारों लोगों के बीच उत्सव के मंच पर दिखाई देता है, तो लोगों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।

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एक तरफ भाई की विदाई का गम… दूसरी तरफ हजारों लोगों के बीच गीत और जयघोष। इसी विरोधाभास ने इस पूरे घटनाक्रम को चर्चा में ला दिया है।

हालांकि, मनोज तिवारी ने कार्यक्रम के दौरान कोई ऐसा बयान दिया हो जिससे उनके निजी शोक या इस कार्यक्रम में शामिल होने की वजह स्पष्ट होती हो, ऐसी जानकारी इस सामग्री में उपलब्ध नहीं है।

इसलिए फैसला सुनाना नहीं, सवाल पूछना जरूरी है—क्या सार्वजनिक जीवन में निजी दुख की भी कोई समय-सीमा होती है?
या फिर हर व्यक्ति को अपने दुख से निपटने का तरीका चुनने की पूरी आजादी होनी चाहिए?

शायद इसका जवाब हर व्यक्ति अपने अनुभव और संवेदनाओं के हिसाब से देगा।

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