कभी दुल्हनों की पहली पसंद थी 52 बूटी साड़ी, अब मजदूरी करने को मजबूर हुए कारीगर


बिहार : नालंदा की प्रसिद्ध 52 बूटी साड़ी कभी शादी-विवाह में दुल्हनों की पहली पसंद मानी जाती थी। हाथों से तैयार होने वाली इस पारंपरिक साड़ी की पहचान देश ही नहीं, विदेशों तक थी। खास डिजाइन और बारीक बुनाई वाली इस कला ने लंबे समय तक नालंदा को अलग पहचान दिलाई, लेकिन अब इस कला से जुड़े कई कारीगर मजदूरी करने को मजबूर हो गए हैं।

इस पारंपरिक कला को पहचान दिलाने में राष्ट्रपति सम्मान प्राप्त स्वर्गीय कपिल देव प्रसाद सिंह का बड़ा योगदान रहा। उन्होंने हजारों बुनकरों को प्रशिक्षण देकर 52 बूटी साड़ी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया। इस साड़ी में हाथों से 52 तरह की बूटियों की डिजाइन बनाई जाती है, जो इसकी खास पहचान मानी जाती है।
बदलते फैशन, मशीन से बने कपड़ों और बाजार की कमी के कारण इस कला का दायरा लगातार सिमटता गया। हालत यह हो गई कि कई बुनकरों ने अपना पुश्तैनी काम छोड़ दिया। हालांकि अब सरकार और हस्तशिल्प विभाग की ओर से इस कला को फिर से जीवित करने की कोशिश की जा रही है। स्थानीय कारीगरों का कहना है कि सही बाजार और प्रोत्साहन मिले तो नालंदा की 52 बूटी साड़ी फिर से अपनी पुरानी पहचान हासिल कर सकती है.


